भैरो सिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री एवं भारत के उपराष्ट्रपति : श्रद्धान्जलि

भैरोसिंह शेखावत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे और उपराष्ट्रपति के पद पर आसीन होने के पश्चात राजनीतिक क्षेत्र से सेवानिवृत हुए। मार्च 1972 के लोकसभा चुनाव में  भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के रूप में उनसे मुझे एक मुलाकात  का  अवसर मिला था । उसके पूर्व अटल बिहारी वाजपेई जी के नेतृत्व में जब सेना द्वारा विजय प्राप्त क्षेत्र में आंदोलकारी लोगों ने प्रवेश किया था और उन्हें  रात्रि में जुलाई में 1971 में मेरे समक्ष सेना  के अधिकारियों ने प्रस्तुत किया था तब मैंने उन्हें अटल जी के साथ देखा था और उस समय कोई बातचीत नहीं हुई थी  ।
 1977 में पहली बार जब जनता पार्टी की सरकार में श्री शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री बने तब जुलाई 1977 में उन्होंने मुझे भरतपुर जिलाधीश का के पद पर स्थानांतरित किया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर आग्रह  किया था कि मैं अपने पूर्व एस डी ओ पद के  अनुभव को देखते हुए भरतपुर जिले का चार्ज शीघ्र    संभाल लूं । दो-तीन  स्थानांतरण 1 वर्ष में हो चुके थे 
 मैं इसके पूर्व गंगानगर जिलाधीश के पद से जयपुर स्थानांतरित होकर आया ही था अतः दो माह में फिर  भरतपुर जाना  परिवार के लिये भी  कष्टकर था।
 भरतपुर में बाढ़ आई हुई थी और 5 अगस्त को  मुख्यमंत्री जी वहां दौरे  पर गए हुए थे ।बाढ़ को दृष्टिगत रखते हुए मुझे उनके आग्रह के अनुसार तुरंत 6 अगस्त को ज्वाइन करना पड़ा।
 मैंने बिना चार्ज लिए अपना कार्य शुरू कर दिया था ।बाढ़ भरतपुर  जिले में फरवरी -मार्च 1978 तक कमोबेश बनी रही।मार्च में पंचायत का चुनाव प्रबंध  करना पड़ा किंतु अप्रैलआते आते मेरी सांसद पंडित राम किशन  से कुछ राजस्व पटवारियो के ट्रांसफर के सिलसिले में हल्की-फुल्की कहा -सुनी होगई ।उन्होंने मुख्यमंत्री जी से मेरे स्थानांतरण की सिफारिश कर दी ।आपातकाल के दौरान वे मुख्यमंत्री जी के साथ जयपुर में नजरबंद रहे और समाजवादी पार्टी के लीडर होने के बावजूद  मुख्यमंत्री जी के करीब आ गए थे। फलस्वरूप मई 1978 में मेरा  एक्साइज कमिश्नर ,उदयपुर के पद पर ट्रांसफ़र  हो गया।मुख्य सचिव श्री भनोत  ने कहा  मेरी कोई गलती नहीं होते हुए भी स्थानांतरण की पालना करने की  सलाह दी।

कालांतर में 1989 में चुनाव के पश्चात भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। श्री शेखावत फिर  मुख्यमंत्री बने। मैं उस समय डिविज्नल कमिश्नर, जयपुर के पद पर कार्यरत था।  1991 में उन्होंने मेरा स्थानांतरण सचिव शिक्षा राजस्थान पद पर किया किंतु जुलाई 1991 से अक्टूबर 1992 तक में इस पद पर रहा। तत्पश्चात मुझे सचिव सिंचाई के पद पर पस्थापित किया ।दिसंबर 1992 में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया  । 
राज्य में राष्ट्रपति शासन के पश्चात 1993 में  भैरोसिंह सिंह शेखावत की सरकार बनी एवं वे पूरे 5 वर्ष तक 1998 तक सता मे रहे। 1994 में उन्होंने मुझे राजस्व सचिव के पद पर पदोन्नति पर पदस्थापित किया और मुझे राजस्व अधिनियमों को एकीकृत करने की सलाह दी ।
 गंगाराम चौधरी बाड़मेर से  से निर्दलीय चुन कर आए थे और राजस्व उपमंत्री के रूप में मंत्रिमंडल में शामिल थे। मेरा उनसे बाड़मेर से परिचय था जब वे जिला प्रमुख थे और राजस्व  उप मंत्री भी थे।  उनकी अध्यक्षता में गठित राजस्थान राजसव कानून  सुधार समिति द्वारा  संबंधित अधिनियमों में सुधार हेतु विस्तृत सुझाव प्रस्तुत किए गये ।
 प्रमुख   सचिव के पद पर पदोन्नति के पूर्व मुझे अध्यक्ष राजस्थान टैक्स बोर्ड अजमेर के पद पर पदोन्नत कर स्थनांतरित किया गया था। मेरी पुत्री एवं पुत्र दोनों ही क्रमशःएम ए एवं एवं इंजीनियरिंग के फाइनल इयर में पढ़ रहे थे ।सुबह- सुबह जाकर जब यह बात  उनके चेंबर में मैने बताई तो उन्होंने स्वयं कहा कि 'यह तो मुझसे गलती हो गई मुझे  मालूम नहीं था। मैं  अभी आदेश देता हूं ।' तत्काल  अपने सचिव  सुनील अरोरा को राजस्व प्रमुख सचिव  के पद पर मेरे  प्रोमोशन  का ऑफिस नोट तैयार करने का आदेश दिया। मेरे सामने  उस  पर चंद मिनटो  में  हस्ताक्षर कर दिए।साथ में यह भी कहा कि मैं मेरे कर्तव्यनिष्ठा एवं ईमानदारी के बारे में  उन्हें कभी संदेह नहीं था ।3 वर्ष  उस पद पर रहा।  इस दौरान कई  घटनाएं हुई। एक  का जिक्र करना चाहता हूं।करौली को जिला बनाने  के लिए आर एस  कूमट  समिति ने अपनी सिफारिश दे दी थी जो राज्य सरकार के विचार अधिनियम थी। फरवरी 19 96 करौली जिले का  मुझे  एक  डेलिगेशन मिलने आया था जिनको मैंने स्पष्ट बता दिया था कि  उस वर्ष के अंदर करौली जिला बनना संभव नहीं था क्योंकि बजट में इसका कोई प्रावधान नहीं था ।डेलिगेशन मुख्यमंत्री से मिलने गयाऔर उन्होंने अपने अंदाज में समझा  करके विदा  कर दिया। फिर मुझे बुलाया और बोले श्रीवास्तव आप सीधी सपाट  हिंदी में जवाब दे देते हैं ।हमारे लिए कुछ कहने को रहने दीजिए ,कुछ क कुछ कागज- कुछ समय रखिए जल्दी में जवाब मत दीजिए ।मैंने उनकी सीख से सबक लिया किन्तु  अपनी आदत से मजबूर रहने के कारण अपनी स्पष्टवादिता को बरकरार रखा। श्री शेखावत की  सोच हमेशा उच्च स्तर की थी। वे राष्ट्रीय हित में सोचते थे और अपने भाषणों में जनसंख्या ,जल सप्लाई एवं स्त्री शिक्षा पर जोर  दे कर  भाषण  एवं बात हमेशा करते  थे ।
उनके साथ शिक्षा सचिव के पद पर कार्य करते हुए दो-तीन बार उन्होंने लंच समय  बुलाया  था और अपनने टिफिन के साथ बैठकर खाना खाने को कहा क्योंकि उन्होंने मालूम कर लिया था कि खाते वक्त लंच के समय बुलाया  था ।उन्होंने आग्रह पूर्वक एवं स्नेह से मुझे अपने साथ बैठकर भोजन कराया।दीपावली एवं होली पर उनसे मुख्यमंत्री निवास पर मिलने  पहुंचने पर अपने साथ सोफे पर बिठा लेते, प्रेम पूर्वक बात करते और हंसी मजाक भी साथ में करते जैसी की उनकी आदत थी।
 संस्मरण को पूरा करने के पूर्व मुझे दो घटनाएं याद आ रही है जो उनके व्यक्तित्व को दर्शाती हैं पहली घटना बाड़मेर जिले में उनके भारतीय जनसंघ के संसदीय उम्मीदवार के समय की है। रात्रि को 1:30 बजे उन्होंने मुझे फोन किया जो मैंने स्वयं उठा लिया ।उन्होंने कहा आपने फोन स्वयं क्यों उठाया ? मैंने कहा चुनाव के समय में फोन अपने पास रखता हूं ना कि संतरी  या  चौकीदार के पास ।उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया और फिर अपनी बात इस प्रकार बताई कि एक ड्राइवर के साथ किसी की मारपीट हो गई थी और वह ड्राइवर उनके प्रचार की गाड़ी का था।पुलिस स्टेशन बालोतरा में केस रजिस्टर कराना था जो नहीं हो रहा था।मेरे हस्तक्षेप की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि एस पी साहब सो रहे थे और जगाने के लिए उन्होंने संतरी को मना  किया था
 मैंने  बालोतरा के डिप्टी एसपी से बात की।
 उन्होंने बताया कि घटना पाली जिले में की है जो कि  बाड़मेर के सीमा पर स्थित था।मैंने उन्हें याद दिलाया कि सीआरपीसी में एक प्रावधान है कि समीप  के पुलिस स्टेशन में केस दर्ज  कराया जा सकता है और संबंधित पुलिस स्टेशन को बाद में भेजा जा सकता है ।केस  बालोतरा पुलिस स्टेशन में दर्ज हो गया।श्री शेखावत के  बात करने का अंदाज मुझे अभी भी याद है।
 दूसरी घटना राम जन्मभूमि  शिलान्यास आंदोलन से संबंधित है। सोशलिस्ट  के शासन में उत्तर प्रदेश में आंदोलन कारी लोगों पर पुलिस नए गोली  चलाई  और 20-22 लोग लोगों की मृत्यु हो गई। तब राजस्थान के आंदोलनकारी उत्तर प्रदेश से लौट रहे थे ।आगरा पहुंचने पर राजस्थान जाने के लिए रोडवेज की बस भरतपुर आगरा  की सीमा पर उपलब्ध कराई गई थी । उन्होंने मुझे फोन पर निर्देश दिए कि आंदोलनकारी सरकारी बस में टिकट लेकर बैठे। उन्हें सरकार को की ओर से बस की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। जयपुर के डिवीजनल कमिश्नर के पद पर कार्यरत रहते हुए मैंने इसी प्रकार के आदेश पर रोडवेज एवं अन्य संबंधित अधिकारियों को दिए।इस प्रकार शेखावत की स्पष्ट सोच सरकार  की नीतियों को राज्य धर्म के अनुसार ढालने में  सक्षम थी। 
सेवा से रिटायर  होने  के बाद 2004 में मै   उनसे मिलने  नई दिल्ली गया था। उन्होंने   ड्राइन्ग  रूम  चाय नाश्ता  कराया। मैने  उन्हे अपने   कुछ   प्रकाशित  लेख  दिखाये।उनहोंने  मुझे  प्रोत्साहित  करते हुये  लेखन कार्य  करते रहने  की सलाह दी।
सहर्ष नव प्रकाशित पुस्तक  कितने  प्रश्न चिन्ह के  विमोचन  की स्वीकृति भी दे दी। उनके द्वारा उपराष्ट्रपति  निवास में  इस पुस्तक  का विमोचन  करते हुए उनहोंने  पूछा प्रश्न  उठाये  हैं और  सुझाव दिए या नहीं। मित्र गण  और मौजूद  दर्शक  हंस पड़े। श्री मनोहर प्रभाकर  राजस्थान पत्रिका  के रविवार परिशिष्ट के तत्कालीन  सम्पादक महोदय और मैने संक्षेप मे पुस्तक  पर चर्चा  की।सभी लेख  रराजस्थान पत्रिका  में प्रकाशित हुए थे।

 श्री भैरोसिंह जी शेखावत को धन तेरस एवं  उनके जन्म दिवस जयंती पर  स्मरण अंजलि प्रस्तुत करता हूं।

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